सरकारों को झुका देने वाले साधु आखिर मान ही गए !

धर्म आध्यात्मिक

नई दिल्ली: हरिद्वार में लगा कुंभ मेला कोरोना के संक्रमण को फैलाने में काफी हद तक सहायक साबित हुआ है. ऐसे में स्वास्थ्य विशेषज्ञों से लेकर सियासी गलियारों में जो सवाल उठ रहा था कि साधु-संत अगर समय से पहले कुम्भ का समापन नहीं करना चाहते, तो अगला शाही स्नान सिर्फ सिम्बोलिक यानी प्रतीकात्मक क्यों नहीं कर सकते हैं? आज उन्होंने खुद ही इसका एलान करके सराहनीय फैसला लिया है, जिसका स्वागत होना चाहिये. अब लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ भी नहीं जुटेगी और हर अखाड़े के कुछ प्रतिनिधि गंगा में डुबकी लगाकर अपनी धार्मिक आस्था भी पुरी कर लेंगे.

 

वैसे अगला व अंतिम शाही स्नान 27 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा के अवसर पर होना है. इस दिन को अमृत योग का दिन माना जाता है, इसलिए देश-विदेश से लाखों की भीड़ जुटने की संभावना है. लेकिन इससे पहले 21 अप्रैल को रामनवमी के मौके पर महाकुंभ का बड़ा स्नान भी है. ग्रहों की चाल के मुताबिक रामनवमी के दिन नदियों का जल बेहद पवित्र हो जाता है. प्रशासन को इस मौके पर भी काफी भीड़ जुटने की उम्मीद इसलिये भी थी कि आस्था के आगे कोरोना का डर भी बेकार होता दिख रहा है.

इस बार कुम्भ में कुल 13 अखाड़े जुटे हैं जिसमें से निरंजनी व आनंदी अखाड़े ने 17 अप्रैल को ही कुम्भ ख़त्म होने का एलान करके अपना बोरिया बिस्तर समेटना शुरू कर दिया था. लेकिन बाकी के 11 अखाड़े अभी भी खूंटा गाड़कर अपनी जिद पर डटे हुए हैं कि वे अंतिम शाही स्नान किये बगैर वहां से नहीं जाने वाले.

 

वह भी ऐसी हालत में जबकि मध्य प्रदेश के निर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर कपिल देव दास की कोरोना से मौत हो चुकी है और अन्य 68 शीर्ष साधुओं में कोरोना का संक्रमण पाया गया है और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. उल्लेखनीय है कि निरंजनी अखाड़े सचिव रविंदर पुरी ने दो दिन पहले ही ऐलान कर दिया था कि “14 अप्रैल को संक्रांति के मौके पर हुआ मुख्य स्नान खत्म हो चुका. हमारे अखाड़े में बहुत सारे लोगों को कोविड के लक्षण हैं. इसलिए हमारे लिए कुंभ मेला खत्म हो चुका.”किन बाकी के अखाड़े इसके विरोध मे उतर आये हैं और उन्होंने इस मामले पर निरंजनी अखाड़े से माफी मांगने को कहा है. निर्वाणी अखाड़ा के अध्यक्ष महंत धर्मदास ने कहा की कुम्भ मेले की समाप्ति की घोषणा का अधिकार केवल मेलाधिकारी या प्रदेश के मुख्यमंत्री को है. उन्होंने कहा कि निरंजनी अखाड़े ने बिना किसी सहमति के ऐसा कहकर समाज में अफरातफरी मचाने का अक्षम्य अपराध किया है और ऐसे में उनके साथ रहना मुश्किल है.महंत धर्मदास ने यह भी कहा कि निरंजनी अखाड़े को अपने ऐसे बयान के लिए पूरे अखाड़ा परिषद के सामने माफी मांगी चाहिये और तभी उसके साथ आगे बने रहने पर विचार किया जा सकता है. उनके मुताबिक ऐसा महत्वपूर्ण फैसला सभी 13 अखाड़े मिलकर लेते हैं.

हालांकि उत्तराखंड के बीजेपी नेता सभी अखाड़ों के प्रतिनिधियों से बात कर उन्हें समझाने की कोशिश के रहे हैं कि वे खुद ही शाही स्नान स्थगित कर कुंभ समाप्ति की घोषणा कर दें या फिर स्नान के लिए उनके अखाड़े आएं भी तो उसमें कुछ ही साधु शामिल हों.

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